संतोष अमन की रिपोर्ट:
आज दिनांक 1 जुलाई को स्वामी विवेकानंद राष्ट्रीय युवा मंच के कार्यालय में 1965 भारत-पाकिस्तान के युद्ध के परमवीर चक्र से सम्मानित योद्धा शहीद अब्दुल हमीद की जयंती पर एक पुष्पांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मंच के संयोजक अनुज कुमार पांडेय की अध्यक्षता में पूर्व वार्ड पार्षद बसन्त कुमार, समाजसेवी चिंटू मिश्रा, अजय कुमार पांडेय, दीपक पाठक, डॉक्टर विकाश मिश्रा, डॉक्टर शरतचन्द्र पाठक, अभय कुमार पांडेय, आकाश मिश्रा, अभिषेक, आदर्श कुमार, प्रकाश, प्रियंका आदि उपस्थित रहे। सभी लोगों ने शहीद अब्दुल हमीद के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें हृदय से नमन किया, एवं उनकी राह पर चलते हुए राष्ट्रसेवा में खुद को समर्पित करने का संकल्प लिया। ज्ञात हो कि शहीद अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जिले में 1 जुलाई 1933 को हुआ था।
वार्ड पार्षद बसन्त कुमार ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब्दुल हमीद जैसे वीरपुत्रों के करण ही भारत माता की ओर कोई आंख उठा कर नहीं देख सकता है। उनका अमर बलिदान भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों की तरह चमक रहा है।
अनुज कुमार पांडेय ने शहीद अब्दुल हमीद की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे अपने देश के प्रति पूरी निष्ठा के साथ समर्पित थे।
वीर अब्दुल हमीद भारतीय सेना के एक साहसी और प्रसिद्ध सिपाही थे जिन्होंने अपने सेवा काल में सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल और रक्षा मेडल से सम्मान प्राप्त किया था। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में अद्भुत युद्ध कौशल और असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें महावीर चक्र और परमवीर चक्र प्राप्त हुआ था। बचपन से ही उन्हें दूसरों की सहायता करने में आनन्द आता था, अन्याय के खिलाफ वे आवाज उठाने में जरा भी संकोच नहीं करते थे, इसी का एक उदाहरण है कि एक बार उनके गांव के एक किसान की फसल बलपूर्वक काटने के लिए जमींदार के 50 आदमी उस किसान के खेत पर पहुंचे, वहां पर अब्दुल हमीद ने किसान के समर्थन में और अन्याय के खिलाफ उन्हें ललकारा , अब्दुल हमीद की ललकार को सुनकर वे लोग उल्टे पांव वापस आ गए।इसी प्रकर बाढ़ प्रभावित गांव के दो युवतियों को उन्होंने डूबने से बचाया था। अब्दुल हमीद की भारत के दुश्मनों को ध्वस्त करने की लालसा उस समय पूरी नहीं हो सकी जब 1962 में चीन ने भारत के पीठ में छुरा घोंपा। लेकिन जल्द ही 1965 में उनकी लालसा पूरी हो गई। वे अपने भाई से कहा करते थे कि सेना में उन सैनिकों की ज्यादा ईज़्ज़त होती है जिन्हें कोई चक्र प्राप्त होता है और मैं एकदिन जरूर चक्र प्राप्त करूँगा। 1965 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध में भारत माता के उस अमर पुत्र की लालसा पूरी हुयी, उन्होंने अकेले ही अपनी जान की परवाह किये बगैर पाकिस्तान के अभेद्य अनेकों पैटन टैंको को जला दिया और दुश्मन सैनिकों के साहस को चकनाचूर कर दिया, उनके इस अद्भुत युद्ध कौशल और शौर्य को देखकर भारतीय सेना के हौसले बुलंद हो गए जिसके कारण भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह पराजित किया। किन्तु पाकिस्तानी टैंको और पाकिस्तानी हौसलों को जलाते हुए भारत के एक दर्जी परिवार में जन्मा और अपने पराक्रम से दुश्मनों के दांत खट्टे करनेवाला वह अद्भुत योद्धा मात्र 32 वर्ष की आयु में अपनी प्यारी मातृभूमि के स्वाभिमान के रक्षार्थ बलिदान हो गया। आज जब देश में देश विरोधी नारों की जब गूंज सुनाई देती है तो ऐसा लगता है देश विरोधी नारे लगानेवालों ने बचपन में इस महानायक के बारे में नहीं पढ़ा।
अभी भी देर नहीं है सरकार और प्रशासन तंत्र विद्यालयों में ऐसे योद्धाओं की जीवनी पढ़वाकर देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकता है। मंच केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों से यह मांग करता है कि शहीद अब्दुल हमीद की जीवनी को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करें और भारत के प्रत्येक जिले में इनकी प्रतिमा स्थापित करे, जिससे बच्चे इनके त्याग, बलिदान और देशप्रेम के रास्ते पर चलकर देश के विकास में अपना योगदान दे। मंच इस प्रकार के विद्यार्थियों के बीच अनेकों आयोजन करके ऐसे महापुरुषों की जीवन गाथा को बताता रहा है। मंच का मुख्य उद्देश्य यही है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में और भारत के स्मिता की रक्षा हेतु खुद को न्योक्षावर कर देने वाले अमर बलिदानियों की जीवनगाथा को छात्र और छात्राओं के बीच ले जाया जाय और उन्हें देशसेवा के लिए प्रेरित किया जाय।