आज दिव्यांगता दिवस मनाया जाएगा। एक बार फिर से दिव्यांगों के उत्थान के लिए सरकारी स्तर पर तरह-तरह की घोषणाएं होंगी लेकिन दिव्यांगों के लिए चलाए जा रहे हैं,सरकारी सुविधाओं का लाभ दिव्यांगों को तभी मिल पाएगा जब उनके पास दिव्यांगता प्रमाण पत्र होगा । स्थिति यह है कि स्थानीय स्तर पर सिर्फ अस्थि दिव्यांगों की जांच कर उनका प्रमाण पत्र बनाने की सुविधा ही उपलब्ध है गला से ऊपर या मानसिक दिव्यांगों का जांच हेतु उन्हें सदर अस्पताल या बड़े सरकारी अस्पतालों में रेफर कर देना ही एकमात्र विकल्प है, जो आर्थिक रूप से अक्षम दिव्यांगों या उनके अभिभावको के लिए संभव सा नहीं दिखता। 25 से 30% का ही बनता प्रमाण पत्र- एक अनुमान के मुताबिक महज 25 से 30% दिव्यांगों का ही प्रमाण पत्र मिल पाता है जो अस्थि निशक्त होते हैं और स्थानीय स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में आयोजित शिविर में चिकित्सीय जांच के बाद उनका दिव्यांगता प्रमाण पत्र बन पाता है। मुकबधीर, नेत्रहीन या अन्य श्रेणी के दिव्यांगों का स्थानीय स्तर पर प्रमाण पत्र नहीं बन पाता ।इसके कारण दिव्यांगता पेंशन तक प्राप्त करने में या इसका आवेदन करने में दिव्यांगों को कठिनाई होती है। दो वर्ष पहले 100 दिव्यांग बच्चों की जांच हुई थी, जिन्हें सहायक उपकरण दिया जाना था लेकिन बमुश्किल 35 बच्चों को ही उपकरण वितरित किया जा सका ।इसका कारण यह था कि शेष बच्चों के पास दिव्यांगता प्रमाणपत्र ही नहीं थे। जांच करने पहुंचे एलीम्को के पदाधिकारी के अनुसार, करीब 60 से 70% बच्चों के पास दिव्यांगता प्रमाण पत्र नहीं हो पाता ।सरकारी प्रावधान के अनुसार जिन बच्चों की जांच के बाद उनके लिए सहायक उपकरण उपलब्ध कराया जाता है ,वैसे बच्चों का दिव्यांगता प्रमाणपत्र होना अनिवार्य है ।लेकिन अधिकांश बच्चों के पास दिव्यांगता प्रमाण पत्र नहीं रहता, इसके कारण उन्हें उपकरण नहीं प्रदान किया जाता । नेत्रहीन एक्यूप्रेशर चिकित्सक डॉ विकास मिश्रा का कहना है कि यही स्थिति दिव्यांगों के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे अन्य सुविधाओं में भी है, यहां तक कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन समय पर नहीं मिल पाता।
क्या है समस्या:
दरअसल समस्या यह है कि आंख, कान, नाक,मुंह रोग विशेषज्ञ एवं मानसिक रोग विशेषज्ञ के नहीं होने के कारण औरंगाबाद जिले में या किसी भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में गला से ऊपर का दिव्यांगता जांच नहीं हो पाता और ना ही ऐसे दिव्यांगों का प्रमाण पत्र बनता है।पी एच सी सूत्र ने बताया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर प्रत्येक महीने के प्रथम व तीसरे शुक्रवार को दिव्यांगता जांच शिविर का आयोजन किया जाता है ।अस्थि निःशक्त दिव्यांगों की जांच करने के बाद मेडिकल टीम द्वारा इसका प्रमाण पत्र बना दिया जाता है, लेकिन गला से ऊपर के अंगों एवं मानसिक दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनाने के लिए सदर अस्पताल औरंगाबाद कर दिया जाता है। सदर अस्पताल में भी इसके विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं, जिसके कारण वहां से मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल गया या अन्य बड़े सरकारी अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है।
क्या हो सकता है समाधान :
सरकारी स्तर पर ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिला या प्रखंड स्तर पर विशेष शिविर आयोजित वैसे दिव्यांग व्यक्तियों की जांच कर उनका दिव्यांगता प्रमाण पत्र निर्गत किया जाए,जिस अंग के विशेषज्ञ चिकित्सक जिले में पदस्थापित नहीं हैं,उनके विशेषज्ञ चिकित्सक को शिविर में बुलाया जाए।
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक मुहिम का हिस्सा है दिव्यांग दिवस:
प्रतिवर्ष 3 दिसंबर का दिन दुनियाभर में दिव्यांगों की समाज में मौजूदा स्थिति, उन्हें आगे बढ़ने हेतु प्रेरित करने तथा सुनहरे भविष्य हेतु भावी कल्याणकारी योजनाओं पर विचार-विमर्श करने के लिए जाना जाता है। दरअसल यह संयुक्त राष्ट्र संघ की एक मुहिम का हिस्सा है जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों को मानसिक रुप से सबल बनाना तथा अन्य लोगों में उनके प्रति सहयोग की भावना का विकास करना है। एक दिवस के तौर पर इस आयोजन को मनाने की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1992 से हुई थी। जबकि इससे एक वर्ष पूर्व 1991 में सयुंक्त राष्ट्र संघ ने 3 दिसंबर से प्रतिवर्ष इस तिथि को अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस के रूप में मनाने की स्वीकृति प्रदान कर दी थी।
