बहना ने भाई की कलाई पे प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है..’

बहना ने भाई की कलाई पे प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है..’ ‘भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहन को न भुलाना , सुमन कल्याणपुरी और लता मंगेशकर द्वारा गाया गया रक्षाबंधन का ये गीत भले ही ज्यादा पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलसिला सदियों पुराना है, जो आज भी कायम है। आदि काल से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए  आज रक्षाबंधन पर हर बहन अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांध रक्षा का वचन लेगी।
भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षा बंधन का त्यौहार सोमवार को पूरे जिला में  मनाया जाएगा। बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांध कर उससे सदैव अपनी रक्षा का संकल्प लेंगी। हालांकि रक्षा बंधन की पूर्व  जहां बाजार गुलज़ार रहता था ,वहां लॉक डाउन के वजह से सब फीका है।मिठाई की दुकान सिर्फ डिलिवरी के लिए खुल गया है।शारीरक दूरी बनाते हुए सिर्फ मिठाई पार्सल लेने की छूट है।वहीं राखी के भी स्टोल लगे हुए हैं,अब तो राखी के साथ साथ मास्क भी बेचे जा रहे हैं।
रक्षा बंधन के त्योहार के प्रति महिलाओं में भारी उत्साह रहता है। जिसमें कई बहनें शाम को अपने भाइयों के पास पहुंच जाती है ताकि सुबह शुभ मुहुर्त के अनुसार राखी बांध सके। बदलते दौर में बहनों द्वारा भाई को पैक गिफ्ट देने का भी प्रचलन शुरू हो गया है।

इस बार रक्षा बंधन बेहद है शुभ:

पंडित लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि इस बार शुभ मुहर्त प्रातः 8 बजकर 38 मिनट से रात्रि 8 बजकर 20 मिनट तक है।महत्वपूर्ण समय 11:30 से दोपहर 12 :30 के अंदर है।
भाई राखी बंधवा बहन की रक्षा का भार अपने उपर लेता है ।ऐसे  ब्राह्मण के लिए यह महीना भर महत्वपूर्ण होता है अपने अपने घर में कूल देवता की पूजा करते हैं ।
सभी लोग सावनी पूजा का विशेषता जानते हैं ।
कुछ लोग के यहाँ सावनी पूजा-किए  बिना कराही में पकवान भी नहीं बनाया जा सकता है ।त्योहार का महत्व सिर्फ भाई और बहन तक ही सिमटा हुआ नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व भी है। यही कारण है कि इस शुभ पर्व को मान्यताओं और मुहूर्त के अनुसार मनाते हैं

क्या है पौराणिक महत्व:

पंडित लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि रक्षा बंधन का इतिहास हिंदू पुराण कथाओं में है। वामनावतार नामक पौराणिक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है।  राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार का प्रयत्न किया,तो देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु जी वामन ब्राह्मण बनकर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी।वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। उसने अपनी भक्ति के बल पर विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। लक्ष्मी जी इससे चिंतित हो गई। नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बाधकर उसे अपना भाई बना लिया। बदले में वे विष्णु जी को अपने साथ ले आई। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। इसकी अन्य कथाएं भी हैं।

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