
भाई बहन के प्रेम का पर्व है रक्षाबंधन। श्रावणी पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन का दिन खास तौर पर भाई बहन की स्नेह भरे रिश्ते का प्रतीक है। मुख्य रूप से रक्षाबन्धन को हिन्दू आैर जैन त्योहार के तौर पर मान्यता प्राप्त है। ये प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। राखी बांधने के पीछे मूल भावना प्रेम आैर रक्षा का आश्वासन ही होता है।
भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षा बंधन का त्यौहार आज पूरे जिला में धूमधाम से मनाया जाएगा। बहनें आज अपने भाई की कलाई पर राखी बांध कर उससे सदैव अपनी रक्षा का संकल्प लेंगी। इस उपलक्ष्य में रक्षा बंधन की पूर्व संध्या पर शहर के बाजार रौनक रही। दुकानों पर सजी राखियों से स्टाल पर बड़ी संख्या में बहनों की अपने भाइयों के लिए राखी खरीदने के लिए भीड़ लगी रही। इसी तरह मिठाई की दुकानों में महिलाओं की भारी भीड़ रही। जिसके चलते शाम को शहर के बाजार में जबरदस्त रौनक रही। रक्षा बंधन के त्योहार के प्रति महिलाओं में भारी उत्साह रहता है। जिसमें कई बहनें शाम को अपने भाइयों के पास पहुंच जाती है ताकि सुबह शुभ मुहुर्त के अनुसार राखी बांध सके।
रक्षाबंधन के पर्व पर इस बार बहनों को भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए मुहूर्त का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। सुबह से शाम चार बजे तक किसी भी समय बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी को बांध सकती हैं। इस बार 37 साल बाद रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं होगा।इसलिए यह रक्षाबंधन इस बार बहन और भाई दोनों के लिए शुभ माना गया है।
पंडित लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि इस बार रक्षा बंधन बेहद शुभ है।26 अगस्त को सुबह 5:51 बजे ही भद्र का साया खत्म हो जाएगा।इस बार श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 3 बजकर 16 मिनट से शुरू हो कर 26 अगस्त शाम 4 बजकर 16 मिनट तक रहेगी।
पंडित लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि रक्षा बंधन का इतिहास हिंदू पुराण कथाओं में है। वामनावतार नामक पौराणिक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है। राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार का प्रयत्न किया,तो देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु जी वामन ब्राह्मण बनकर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी।वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। उसने अपनी भक्ति के बल पर विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। लक्ष्मी जी इससे चिंतित हो गई। नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बाधकर उसे अपना भाई बना लिया। बदले में वे विष्णु जी को अपने साथ ले आई। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। इसकी अन्य कथाएं भी हैं।
इस पर बहनों ने रखा अपनी बात:
याद आ जाता है बचपन:किरण।

मधु कुमारी

चांदनी कुमारी

किरण कुमारी


मधु कुमारी

चांदनी कुमारी

किरण कुमारी