
आज़ादी
11 अगस्त को जब पटना सचिवालय पर तिरंगा झंडा फहराने के प्रयास में लगे जुलूस पर जिला पदाधिकारी डब्ल्युजी आर्चर ने गोली चलवाया था। एक-एक कर सात सपूत शहीद हो गए। इनकी स्मृति में पटना सचिवालय के पूर्वी गेट पर शहीद स्मारक की स्थापना की गई है। स्मारक की कांस्य प्रतिमाओं में चौथी प्रतिमा औरंगाबाद जिले के ओबरा प्रखंड के खरांटी गांव के जगतपति कुमार की है।ओबरा में पुनपुन नदी के किनारे उनकी याद में इनका स्मारक बना है।आज यंहा इनकी बरसी मनाई जाएगी।तिरंगा यात्रा भी निकाला जाएगा।
तारीख 11 अगस्त 1942, समय ठीक 11 बजकर पांच मिनट, स्थान पटना सचिवालय, भारत मां को ग़ुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने निकली मतवाले युवाओं की टोली जब तिरंगा फहराने सचिवालय पहुंची। बर्बर अंग्रेजी हुकूमत के बंदूकों ने गोलियां उगलने शुरू कर दी।
देखते ही देखते सात नौजवान आजादी की बलि वेदी पर मर मिटे। मगर अंतिम सांस लेने से पहले उन सबों ने देश की आन-बान और शान के प्रतीक तिरंगे को फहरा ही दिया।उन्ही सात में से एक थे शहीद जगतपति उर्फ जागो भैया।
सचिवालय पर तिरंगा फहराते समय गोली जगतपति के पैर में लगी और वे गिर गए। फिर उठ खड़े हुए और सीना खोलकर सामने करते हुए कहा ‘अगर गोली मारनी है तो सीने पर मारो, पैर पर क्यों मारते हो’। लेकिन दूसरी गोली सीने को चीरती हुई निकल गई और जागो वहीं शहीद हो गए
शहीद जगतपति कुमार का जन्म सन 1923 ई. के मई माह में जमींदार परिवार सुखराज बहादुर के घर हुआ था। मां का नाम देवरानी कुंअर था। अपने तीन भाईयों में सबसे छोटे थे। इनकी पांच छोटी बहनें थी। इनके साथ पढ़े सहपाठी इन्हें जागो कह कर पुकारा करते थे। इनकी शिक्षा बीएन कालेजियट स्कूल पटना में पुरी हुई थी। तब इस स्कूल में प्रधानाध्यापक खरांटी के ही रायबहादुर सूर्यभूषण लाल थे। सन् 32 में ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा अध्ययन के समय ही उन्होंने अपने गांव में दीनबंधु पुस्तकालय की स्थापना कि थी। शहादत के समय जगतपति कुमार बीएन कॉलेज पटना में प्रथम वर्ष के छात्र थे। और अपने अंग्रेज के स्थान कदमकुआं स्थित आवास में रहा करते थे।शहीद जगपति को ग्रामीण ‘जागो भइया’ कहकर पुकारते थे। खरांटी के ग्रामीण बताते हैं कि जब ‘जागो भइया’ के शहीद होने की सूचना उनके पिता सुखराज बहादुर को मिली थी तो वे दोनों आंखों की रोशनी गंवा बैठे थे। बताया जाता है कि ‘जागो भैया की मां को भारत सरकार ने पेंशन देने का प्रस्ताव दिया था जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था।
खंडर हो चुका है इनका पुश्तेनी मकान:
जिस घर में शहीद की किलकारियां गूंजी थीं वह अब खंडहर हो चूका है ।मकान पूरी तरह जर्जर हो चुका है,घास फूस उग आया है।उपेक्षा का शिकार हो रहा है शहीद का घर।जिस घर में जगतपति जन्मे थे उसे सरकार स्मारक घोषित करती तो आने वाली पीढ़ी शहीद की शहादत को याद रखती।


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