
चाय, कुर्सी, पर्चे और जगह जगह पर प्रतायशियों के चर्चे चुनावी उत्सव में रंग बिखेर रहे। वार्ड संख्या का विस्तार और वार्ड संख्याओं का सीमांकन कई प्रत्याशियों के उम्मीद पर पानी फेर दिया तो कुछ लोगों के लिए भाग्यशाली साबित हुआ। रही सही कसर पिछड़ा वर्ग का आरक्षण एवं महिला आरक्षण ने पूरा कर दिया। लम्बे समय से आस लगाए कुछ प्रत्याशी मन मसोट कर रह गए और मजबूरन अपने चहेते को प्रतायशि बनवाकर उसके समर्थन की माँग में लग गए।
अब इसमें नया क्या है? पुनर्विरती की तरफ़ अग्रसर है। गिने चुने घर, गिने चुने चेहरे और गिने चुने मतदाता। हर प्रतायशि अच्छे चेहरों को अपनी झोली में कर उनसे और उनके जानने वालों के समर्थन की उम्मीद लगाए बैठे हैं। कोई जाति के जोड़ घटाव का गणित कर रहा है तो कोई निजी स्तर पर अपनी पहचान बनाने में लगा हुआ है। अब देखना है कि क्या रंग लाता है? युवा शक्ति या बूज़ोर्गों का तजुर्बा? कोई जीतकर दुबारा मैदान में है तो कोई पिछले बार हार कर भी इस बार जितने की उम्मीद से मैदान में हैं।
कहने को तो यह वार्ड पार्षद का चुनाव है लेकिन चुनाव लड़ने की शैली, समर्थन और शक्ति प्रदर्शन बड़े चुनाव की तरह दिख रहा। हर कोई अपनी जीत से आश्वस्त है और रहे भी क्यूँ ना? जिसके पास जा रहे ओ उनकी समर्थन की ही बात कर दे रहा क्यूँकि जान पहचान के जो ठहरे। बस उन्हीं अश्वाशन से सब अपनी जीत की दावेदारी ठोक रहे हैं। कई प्रत्याशी तो दूसरे वार्ड में जाकर चुनाव लड़ रहे हैं और अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ महीने पहले से ही वरद निवासियों का हमदर्द बनने का प्रयास कर रहे हैं।
महिला आरक्षित वार्ड होने का भी कोई ख़ास असर महिलाओं में नहीं दिख रहा। नामांकन करना और कुछ महिलाओं से मिलने के अलावा शायद ही किसी महिला प्रतायशि के कार्य शैली में वार्ड के नेतृत्व का हुनर दिख रहा। ऐसे में महिलाओं के पति ही चुनावी मैदान में उतरे हुए दिखाई दे रहे। महिला सशक्तिकरन भी कहीं किनारे पर आँसू बहा रहा। ऐसे में महिला आरक्षित वार्ड का औचित ही क्या?
बस युवा इन जनप्रतिनिधियों से रक उम्मीद लगाए रखे हैं कि इस बार कुछ नया होगा। उनके लिए ओ सारी सहूलत प्राप्त होगी जो एक नगर परिषद के शहर में होता है। उम्मीद है कि बुनियादी चीज़ों को ध्यान में रखा जाएगा जैसे, शौचालय के निर्माण, पियाऊ, आवागमन सम्बंधित समसायाओं से निदान, स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं शिक्षा।
Beautifully and intrestingly explained. Thanks .