दिवाली विशेष : मिट्टी के दिए जलायें, भारतीय संस्कृति अपनायें

एनामुल हक़ की रिपोर्ट:-

दीपावली आते ही लोगों की खुशियाँ बढ़ जाती है और चारों तरफ बाजार में लोगों की भीड़ दिखने लगती है, मिठाई और दीपों के साथ पटाखे भी खूब बिकते हैं लेकिन इस बार पटाखे के बिना ही दीपावली मनेगी ऐसा आप भी संकल्प लें। पटाखे कभी भी किसी धर्म की परंपरा में शामिल नही रहा है लेकिन फिर भी पटाखे हमारे खुशियों में शामिल हो गये और इसका ज्यादा इस्तेमाल कुदरत के लिए खतरा बन गया। तो आइए! इस बार प्राकृतिक फूल, मिट्टी के दिए और रंगोली के साथ दीवाली कुछ ऐसे मनाए की जश्न हो खुशियां हो, पटाखे से निकलने वाली जहर न हो। दीपावली का त्यौहार अंधकार से प्रकाश की ओर जाने के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है तो आइये प्रकाश-पर्व दीपोत्सव को उत्साह, उल्लास एवं उमंग के साथ खुशियां बांटते हुए मनाते है। अपने घर में जगमगाते अनेक दीपों, साथ ही साथ प्रयास करते है उन कोनों तक भी प्रकाश का वाहक बनने का जो रौशनी से अब तक दूर है। इस दीवाली लाते हैं किसी की आँखों में उम्मीद और खुशियों कि चम-चमकती रौशनी के बीच सलाम करते है उनको जो अँधेरे और गोलियों के बीच बॉर्डर पर इस लिए खड़े है ताकि हमारी जीवन तक दुश्मन की काली छाया न आये।

और हाँ ! जैसे दिल करे वैसे मनाइए त्यौहार कोबंधनों से मुक्त हो कर, नकारात्मकता से मुक्त हो कर और बाजारवाद से भी मुक्त हो कर। गरीब के हाँथ द्वारा निर्मित दिए, खिलौने का उपयोग कर उनके घर में भी दिवाली की खुशियां पहुंचाइये। क्यूंकि खुशियां आपके समाज, परिवार और अपनों के बीच ही है।  किसी शोरुम या किसी बाजार में नहीं।

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