
विजन के निदेशक अरविंद कुमार धीरज
यदि प्रैक्टिकल का नंबर हटा दिया जाए तो सारे टॉपर अर्श से फर्श पर आ जायेंगे। यह बात जग जाहिर है जिस बात को कोई भी उजागर नहीं करना चाहता है कि प्रैक्टिकल में 30 में से 27 नंबर कुछ रुपये देकर प्राप्त हुए हैं। यदा कदा ये नंबर फेल करने वाले विद्यार्थी का भी है। यानि कि 27 प्रतिशत मार्क स्कूल के तरफ से बिना कुछ किये मिल जाता है। जिसमे विद्यार्थी की कोई भूमिका नहीं होती। जिस विद्यार्थी को टॉपर बताया जा रहा है, जरा उन्ही से पूछा जाए कि प्रायोगिक परीक्षा देने के दौरान उनके स्कूल में कौन सा कार्य करवाये गये थे?
सच हम सब भी जानते हैं, फिर भी सरकारी परिणामो को ही सही मानते हुए अपने आप को आकलन कर लेना, विद्यार्थी एवं अभिभावकों के लिए घातक साबित होता है। आज जिस स्थिति में हम सब पहुचे हैं, इसमें सरकार से ज्यादा खुद जिम्मेवार हैं। सरकार को क्यों कोसी जा रही है? आज हकीकत को समझ नहीं पा रहे हैं या समझना नहीं चाहते? ये गंभीर सवाल खुद से करें, जवाब मिल जायेगा। आज पैसे देकर नौकरी दिलाने के लिए सभी अभिभावक लाइन में खड़े हैं। उसके लिए पैसा कहाँ से आता है? लेकिन पढ़ाने के लिए पैसा नहीं है, वे अपने आप को गरीब बना लेते है। इस हकीकत को समझना पड़ेगा। विद्यार्थी को चाहिए कि वे अंक को लेकर पढ़ाई करने के बजाय ज्ञान के लिए पढ़ें। सारा हल निकल जायेगा।