जनता की आवाज़ : जनता के पैसों से चलता है बैंक, फिर जनता को ही इतनी परेशानी क्यों?

अरुण कुमार (साईबर कैफे)

एक सवाल सरकार से :- मैंने किताब में पढ़ा था एक शब्द फंडामेंटल राइट जिसका अर्थ होता मौलीक अधिकार। सरकार के आदेशानुसार आप अपना पैसा घर में नहीं बैंक में रखे ताकि वो पैसा का उपयोग हो।  ठीक है, बहुत अच्छी बात है की पैसा घर में नहीं रखे बैंक में रखे ताकि वो पैसा देश के विकाश में काम आ सके पर जब मैं बैंक में पैसा जमा करने जाता हूं तो वहाँ के अधिकारी के नियमो से दो-चार होना पड़ता है। चलिए वो भी ठीक है पर वो अधिकारी हमें कस्टमर न समझ कर एक अफसरशाही जैसा ब्यवहार करता है। जैसे हमारा अपना पैसा वहाँ जमा कर के वो हम पर अहसान कर रहे हैं। जमा करने में लम्बी लाइन, निकालने में लम्बी लाइन और पेपर वर्क उतना ही। फिर जब हम रिक्वेस्ट करते है की हमें बहुत काम है थोड़ा जल्दी कर दीजिये तो उन अफसर को लगता है की हमने बहुत बड़ी गलती कर दी और वो हमें नियम बताने लगते है। तो फिर सरकार हमें ये बताये की हम अपना किमती समय बैंक को क्यों दें? हमारा अधिकार क्या यही है की बैंक को सिर्फ टर्न-ओवर दें बैंक को फायदा पहुंचाए और बदले में ये अफसर हमें सहुलियत न देकर हमें अपना अफसरशाही दिखाए। बैंक की छुट्टी किस दिन को हो जाये पता ही नहीं चलता। दूर-दूर से गांव के लोग बूढ़े और लाचार लोग आते है सुबह-सुबह और जब पता चलता है की बैंक आज बंद है तो सोचिये उनपर क्या बीतती होगी, न बैंक के तरफ से पानी की ब्यस्था न ही पार्किंग की। बस नियम है की चालान कटवाइए और लाइन में लग जाइये। बहुत धुप है साहब, बैंक में एयरकण्डीशन लगा है पर चालू सिर्फ मैनेजर के केबिन में। नया-नया एटीएम खुला है पर पैसा निकलता है बैंक में। ये कौन सी अधिकार मिली है पता ही नहीं चलता। बैंक वाले हमें क्या फालतू का समझ लिए है। कोई काम नहीं है हमारे पास। बस इसका जवाब चाहिए।।         
धन्यवाद

3 comments on “जनता की आवाज़ : जनता के पैसों से चलता है बैंक, फिर जनता को ही इतनी परेशानी क्यों?
  1. विकाश पांडेय says:

    किस बैंक की बात कर रहे हो आप ये भी बता दीजिए

  2. Prakash kumar says:

    बैक की छुट्टी तो तय रहती है.

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