समाज के प्रहरी मीडिया पर हमला क्यो ?


समाज के प्रहरी मीडिया पर हमला क्यो,,,,उग्र भीड़ की कोई जात नही होती कोई चेहरा नही होता,इसका यह मतलब तो नही की ओ अपनी मानसिकता को भूल कर कवरेज कर रहे पत्रकार मीडिया पर हमला कर दे।

मीडिया हमारे चारों ओर मौजूद है, टी.वी. सीरियल व शौ जो हम देखते हैं, संगीत जो हम रेडियों पर सुनते हैं, पत्र एवं पत्रिकाएं जो हम रोज पढ़ते हैं। क्योंकि मीडिया हमारे काफी करीब रहता है। हमारे चारों ओर यह मौजूद होता है। तो निश्चित सी बात है इसका प्रभाव भी हमारे ऊपर और हमारे समाज के ऊपर पड़ेगा ही।

एक समय था जब अखबार को समाज का दर्पण कहा जाता था समाज में जागरुकता लाने में अखबारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह भूमिका किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, विश्व के तमाम प्रगतिशील विचारों वाले देशों में समाचार पत्रों की महती भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। मीडिया में और विशेष तौर पर प्रिंट मीडिया में जनमत बनाने की अद्भुत शक्ति होती है। नीति निर्धारण में जनता की राय जानने में और नीति निर्धारकों तक जनता की बात पहुंचाने में समाचार पत्र एक सेतु की तरह काम करते हैं। समाज पर समाचार पत्रों का प्रभाव जानने के लिए हमें एक दृष्टि अपने इतिहास पर डालनी चाहिए। लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी और पं. नेहरू जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने अखबारों को अपनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हथियार बनाया। आजादी के संघर्ष में भारतीय समाज को एकजुट करने में समाचार पत्रों की विशेष भूमिका थी। यह भूमिका इतनी प्रभावशाली हो गई थी कि अंग्रेजों ने प्रेस के दमन के लिए हरसंभव कदम उठाए। और कभी भी कामयाब नही हुए थे।

लोगो की मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि थोड़े से बात बात पर उग्र होकर हथियार उठा लेते है और मारने पर उतारू हो जा रहे है,सोचते भी नही की परिणाम क्या निकलेगा,ओर मौहोल ऐसा बन जाता है जिससे पूरा समाज प्रभावित हो जाता है।और हम डरकर मूक बने किनारे रहकर देखते रह जाते है।और जो निडर है( पत्रकार)उनपर हमला होते देखते रह जाते है।निर्दोषो की दुकान टूटती है,सर फूटता है,और किसी निर्दोष की जान भी चली जाती है।

देखकर बहुत अफसोस होता है।

            (सभार संजय गुप्ता ,शगुन किराना दुकान दाउदनगर)

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