आपातकाल के 47 वर्ष:

परचा बांटते समय हुए थे गिरफ्तार, उससे पहले हुए थे भूमिगत दाउदनगर के कृष्णा प्रसाद

2020 में दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरी रिपोर्ट

संतोष अमन,दाउदनगर (औरंगाबाद) :

25 जून 1975 की अर्द्धरात्रि में देश में आपातकाल लागू हुआ। इसके बीते हुए 46 वर्ष गए।उस समय देश में तानाशाही शासन कायम हो गया थे। आपातकाल में लोकतंत्र की हत्या सी हो चुकी थी। देशवासियों की अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई थी। किसी की भी आवाज को दबा दिया जाता था। आपातकाल के दौरान सरकार के खिलाफ बोलने वालों को जेल भेज दिया जा रहा था।जेल जाने वालों में दाउदनगर शहर के दुर्गा पथ निवासी 67 वर्षीय कृष्णा प्रसाद भी थे।जिनकी जे0पी0 आंदोलन में सक्रिय भूमिका रही थी।आपातकाल के दौरान वे भूमिगत हो गए।वे लोक समिति का परचा बांटने का काम दाउदनगर व औरंगाबाद में किया करते थे। 8 नवंबर 1975 को औरंगाबाद कचहरी के पास रात में परचा बांटते समय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। करीब तीन महीना औरंगाबाद जेल में रखने के बाद उन्हें गया सेंट्रल जेल भेज दिया गया। 19 महीना तक वे जेल में रहे। उन्हें बिहार सरकार गृह विभाग से परिचय पत्र भी मिला है और वर्ष 2008 से पेंशन भी मिल रहा है।

पूरे भारत मे हो गई थी दहशत:
कृष्णा प्रसाद ने बताया कि इंदिरा गांधी के भ्रष्ट निरंकुश शासन के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने पटना गांधी मैदान से 19 मार्च 1974 को संपूर्ण क्रांति आंदोलन की घोषणा की सभी दलों और संगठनों के समर्थन से यह पूरे भारत में निरंकुश इंदिरा सरकार के खिलाफ जेपी नृत्य में विराट जन आंदोलन का संकल्प लिया इंदिरा गांधी ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए बर्बता पूर्वक लाठी गोलियों से दबाने की कोशिश किया।कायर की तरह क्रांतिकारियों पर गोलियां चलवाई कितने माताओं के गोद सूनी हो गई ।आजाद भारत को पुनः 25 जून 1975 को आधी रात में आपातकाल लगाकर भारत मां को बेड़ियों में जकड़ दिया गया।उसी रात जयप्रकाश नारायण,अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को नज़रबंद किया गया।अब यह आज़ादी की लड़ाई की तरह अंग्रेजो से बर्बता पूर्वक आंदोलनकारियों को नज़रबंद करना शुरु हुआ।पूरे भारत मे गुलामी की दहशत हो गया।

रात्रि में करते थे क्रांति दूत के रूप में काम:
कृष्णा प्रसाद बताते हैं कि तत्कालीन जनसंघ पार्टी का पूर्णकालिक संगठन मंत्री था।कार्यक्रम को रात्रि में बैठक जन समिति संगठन के रूप में करते थे।लगातार बैठक करते रहते थे।।चूंकि जिला संगठन का सारी जिम्मेवारी थी ,खुफिया विभाग भी हमलोगों गिरफ्तार करना चाह रहा था ,हमलोग बचते हुए जेपी आंदोलन को चला रहे थे।उस समय गुलाम भारत की आज़ादी की लड़ाई के तरह हमलोग को क्रांति दूत के रूप में कार्य करना पड़ता था।दिन रात जाग कर पुलिस से बचकर आंदोलन को चलाना बहुत ही कठनाई और जोखिम भरा काम था।हर ग्राम में जेपी के सन्देश पर्चा के रूप में लोगो तक पहुंचाना ,दीवार लेखन रात्रि में हीं संभव होता था।सारे आंदोलन भूमिगत हो कर करना पड़ता था।इसी क्रम में नवीनगर में बैठक होने वाली थी।आठ नवंबर 1975 को औरंगाबाद में रात्रि को पर्चा बाटने के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया।

जेल में सहे थे कष्ट:
जब कृष्णा प्रसाद को गिरफ्तार हुए तो उन्हें औरंगाबाद जेल में रखा गया।जेल में पहले से ही उनके साथी बन्द थे।कुछ दिनों के बाद सभी को गया सेंट्रल जेल भेज दिया गया।जहां 300 से भी ज्यादा आंदोलनकारी बन्द थे।जेल में सहे कष्ट को याद कर उनके आंख भर आती है बताते हैं कि जेल में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करने से दमनकारी सरकार बाज़ नही आती थी।आपातकाल के दौरान उन्होंने जेल से जीवित वापसी की कल्पना ही छोड़ दिया था। उन्होंने कहा कि हम सभी कानून अपने हाथ में नहीं लिया था। कोई अपराध नहीं किया, मगर जेल में बर्ताव तो कैदियों की तरह ही हुआ। मगर जो जेल के बाहर थे, उन्होंने छिपते-छिपाते विचारों को फैलाया। चाहे जो भी रहा हो, जीत हमें मिली और हार उन्हें।आप इंसान को कैद कर सकते हो, उसकी विचारों को नहीं।उन्होंने बताया कि दाउदनगर के राम जी गुप्ता एवं स्व.सूरज पांडेय भी आपातकाल के दौरान जेल गए थे।

एक साल से भी ज्यादा रहे थे जेल में। (अरविंद पांडेय)

गोह निवासी 72 वर्षीय अरविंद पांडेय आपातकाल के दौरान 1 साल से भी ज्यादा जेल में गुजारी थी।19 जुलाई 1975 को भारत सुरक्षा अधनियम धारा 69 लगाते हुए औरंगाबाद जेल भेज दिया गया।फिर वहां से गया सेंट्रल जेल भेजा गया। वे बताते हैं कि जब आपातकाल लगा तो वो बहुत दिन भूमिगत रहे।कभी यंहा तो कभी वहां भटकते रहे ।आखिर कार ये सोचे कि कितना दिन भागते रहेंगे इसके लिए आपातकाल के खिलाफ जन सभा बुलाने की ठानी।19 जुलाई 1975 को गोह में आयोजित जनसभा को वे संबोधित कर रहे थे।तभी तत्कालीन गोह थानाध्यक्ष बलदेव सिंह अपने दल बल के साथ पहुंच कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वे कहते हैं औरंगाबाद जेल में काफी कष्ट में थे ,रहने के नाम पर छोटा जगह जेल में था।पांच दिन बाद उन्हें गया सेंट्रल जेल भेज दिया गया। बताते हैं आपातकाल एक भयावह समान था।सरकार के खिलाफ बोलने वालों को जेल में डाला जा रहा था।

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