संतोष अमन,दाउदनगर:
आज दुनिया की चकाचौंध में चाक की रफ्तार भले ही धीमी हो गई हो, मगर जब दीपोत्सव की बात हो तो मिट्टी के दीपों का अलग ही महत्व है। शनिवार को दीवाली है। कुम्हार जोर-शोर से दीप बनाने में पहले से ही जुटे थे। कहते हैं कि अब पहले जैसे तो बिक्री नही होती है मगर मिट्टी के दीपों का महत्व कम नहीं हुआ है। हर शुभ काम में इनका प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है।जहां पहले मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए गांव-गांव चाक घूमते थे अब यह कम ही देखने को मिलता है।मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगर भी अब इक्का दुक्का ही रह गए हैं। उनके भी आर्थिक हालात खराब हैं।एक समय था जब कुम्हार जाति के लोग खासकर दीपावली के आने का इंतजार पूरा साल करते थे। दीपावली में उनके द्वारा निर्मित छोटे-बड़े दीये और डिबिया लोगों की पहली जरुरत होते थे, लेकिन अब इनकी जगह आर्टिफीशियल दियों ने ले ली है। प्लास्टिक के बढ़ते चलन से मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग भी लगभग खत्म होने की कगार पर है। पहले शादियों के लिए ढबरी और ठंडे पानी के लिए सुराही, मटके व घड़े तैयार किए जाते थे, लेकिन अब ढबरी की जगह प्लास्टिक की प्लेट में खाना परोसा जाता है। घड़े व सुराही की जगह फ्रिज ने ले ली है। लोगों की इस नई पसंद से कुम्हारों के पुश्तैनी कारोबार को गहरा धक्का लगा है। आज कुम्हार जाति के लोगों के सामने ना केवल उनके कारोबार को बंद करने की समस्या खड़ी है। बल्कि सरकार भी इन लोगों की कोई मदद नहीं कर रही है।आधुनिकता के इस युग में बाजार में आधुनिक दीये और मोमबत्तियों की भी खूब डिमांड है। तरह-तरह के दीपक, झालर व रंगबिरंगी डिजाइनों की मोमबत्तियां बाजार में बिक रही हैं।
पहले कई मुहल्ले में घूमता था चाक:
पहले दाउदनगर में कान्दूराम की गड़ही, पासवान टोली,दफ़्फ़ल टोली,लालबन्द टोली,पटवा टोली ,कुर्मी टोली आदि मुहल्ले में कुम्हारों के घर पर चाक घूमता मिलता था।पर अब यह पुश्तेनी धंधा कई स्थानों से लुप्त हो गया।वे व उनके बच्चे दूसरे काम धंधे में लग गए।पहले जहां दीपावली आने के पहले इनके घरों पर ऑर्डर देने के लिए लोग की भीड़ उमड़ती थी वह अब खत्म हो गया।यदा कदा घरों में हीं अब यह धंधा चल रहा है।
अब शुभ कार्य के लिए ही होती है खरीदारी:
जब प्रतिनिधि द्वारा शहर के वार्ड संख्या 9 स्थित कुर्मी टोला में हाल जानने के लिए पहुंचा गया तो 48 वर्षीय संजय प्रजापति चाक चलाते हुए मिलते हैं,वे मिट्टी के दिए तैयार कर रहे थे।उन्होंने बताया कि दिवाली में पहले की तरह दीयों की भी बिक्री नहीं रह गई है। अब लोग सिर्फ शुभ करने के लिए ही इनकी खरीदारी करते हैं। यह अलग बात है कि दीपक की खरीदारी लोग करते जरूर हैं। 25, 50 दीपक हर घर में जलते ही हैं। मांग न होने के कारण बड़े बर्तन , नाद आदि बनाना पूरी तरह बंद कर दिया गया। कुम्हारी कला पर मार हर तरफ से पड़ रही है। लोगों ने अपनी जरूरत के लिए जहां विकल्प तलाश लिए वहीं बर्तन बनाने के लिए मिट्टी मिलना भी मुश्किल हो गया है। पुश्तों से चली आ रही इस कला से अब पेट भरना मुश्किल है। त्योहारों को छोड़कर बाकी दिनों में मेहनत मजदूरी करके ही परिवार का भरण-पोषण करना पड़ता है। पहले गर्मी के मौसम में बर्तनों की अच्छी बिक्री हो जाती थी अब वह भी बंद हो चुका है।
मिट्टी के दीये सबसे शुभ
जानकार बताते हैं कि शास्त्रों में मिट्टी के दीये को सबसे शुभ बताया गया है। आनंद और समृद्धि के लिए लोग गाय के घी के दीपक, बुरे प्रभावों और अशुभ घटनाओं को टालने के लिए तिल के तेल के दीये और वायुमंडल को पवित्र करने के लिए सरसों के तेल के दीपक जलाते हैं। वास्तव में दीये जलाने के कारण वायुमंडल में व्याप्त कई कीटाणुओं व रोगाणुओं का भी नाश होता है।
