शादी -ब्याह में लुप्त हो रही पारंपरिक गाली गीतों की सुमधुर परंपरा

अहो बर मौसी के काहे न लईल—–“, “इहां(गांव का नाम लेकर )के चावल बड़ा नामी जी जरा चख के तु जइह,आ जैतो ओठवा से पानी जी जरा——–”
शादी-ब्याह एवं अन्य मांगलिक अवसरों पर गाए जानेवाले ये पारंपरिक रसीली गाली-गीत अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं।गौरतलब है कि शादी -ब्याह के अवसर पर गीत गाने की परंपरा हमारे देश की संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है।और इसी श्रृंखला की एक कड़ी गाली गीत भी है।इन गीतों के अभाव में विवाह के अवसर को पूर्ण नहीं माना जाता।बिहार और खासकर हमारे मगध क्षेत्र में ऐसे अनेक गाली-गीत प्रचलित रहे हैं जिन्हें विवाह के अवसर पर गाया जाता रहा है।गांव -परिवार की महिलाएं सामूहिक रूप से और पुरी लयबद्धता के साथ जब इन गीतों को गाती थीं तब फिजां में एक गजब की मिठास घुल जाती थी।लोग इसे बड़े ही चुटिले अंदाज में लेते थे। लेकिन आज के बदलते परिवेश में गांव -देहातों में भी ये पारंपरिक मनभावन गाली-गीत सुनने को नहीं मिलते।इसकी जगह अब फिल्मी धुनों पर आधारित एवं द्विअर्थी गीतों का प्रचलन बढा है जिसमें कोई रस और माधुर्य नहीं होता।इसमें सिर्फ अनावश्यक शोरगुल की प्रधानता रहती है।
लोकलुभावनी संस्कृति जा रहे भूलते:
इस संदर्भ में शिक्षक डाॅ0 ज्योति कुमार का कहना है कि आधुनिकता और फैशनपरस्ती के इस दौर में लोग अपनी लोकलुभावनी संस्कृति को भी भूलते जा रहे हैं।अब गाली क्या, मंगल गीत भी रस्मी तौर पर गा दिए जाते हैं।अब तो लोग डांस फ्लोर पर थिरकते हैं।इसका एक बड़ा कारण यह है कि अब नई पीढ़ी को न तो मंगल गीत याद है और न ही गाली।वे आगे बताते हैं कि शादी -ब्याह में वर-वधू पक्ष के परिवारों की अजनबियत को दूर करने के लिए ही मुख्य रूप से गाली-गीत गाए जाते थे। गाली को कोई बुरा नहीं मानता था बल्कि इसके पीछे प्रेम और अपनत्व छिपा होता था।हर कोई इस रस में डूबना चाहता था और जो नहीं डूब पाता, वह अपने को अतृप्त महसूस करता।हर मौके के लिए अलग-अलग गाली, दरवाजा लगने से लेकर पांत में भोजन करने,घूंघट, मंडप -खोलाई तक महिलायें बारातियों को गाली देती थीं।बारात में आए बड़े-बुजूर्ग खुद लड़की पक्षवालों को कहते यह लड़के के मामा हैं,यह फुफा हैं,बहनोई हैं,मौसा हैं।इनको भी गाली दिलवाइये। बारात में आये छोटे-छोटे बच्चों से लड़की पक्ष के लोग गाली देने के लिए रिश्तेदारों के नाम पूछते।लेकिन अफसोस कि वक्त के थपेड़ों ने आपसी प्रेम और अपनत्व के साथ-साथ हमारी लोकसंस्कृति को भी पूरी तरह से गायब कर दिया है।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.