जनता की आवाज़: चिठ्ठी से लेकर व्हाटसअप तक, कितना कुछ बदल चुका

जनता की आवाज़: संतोष अमन

चिठ्ठी आई है ,आई है चिठ्ठी आई है गजल गायक पंकज उदास की यह गजल उन दिनों की यादों को ताजा करती है जब लोग एक खत के इंतजार में कई माह गुजार देते थे। पर चिठ्ठी पोस्ट कार्ड अब गुजरे जमाने की बात हो गई है और उसकी जगह मोबाइल व कंप्यूटर ने ले ली है।

दूरदराज स्थित रिश्तेदार, कोई शुभचिंतक, देश की रक्षा में लगे अपने बेटे का हाल जानने के लिए मां या फिर अपने प्रीतम को भेजे एक संदेश का जवाब जानने के लिए पत्नी दरवाजे की चौखट पर खड़ी होकर डाकिए के इंतजार में घंटों गुजार देती थी। पर मोबाइल क्रांति ने इसे गुजरे जमाने की कहानी मात्र बना दिया है। आज पोस्ट कार्ड, अंतरदेशीय आदि का प्रयोग होना बिल्कुल ही बंद हो गया है और न ही दरवाजे की चौखट पर डाकिए का इंतजार होता है। लोग अपने संदेश ई-मेल व मोबाइल से मैसेज के माध्यम से अपने शुभचिंतकों तक भेजते है। क्योंकि इन सालो में मुख्य डाक विभाग द्वारा एक भी अंतरदेशीय की ब्रिकी नहीं की गई। न पोस्ट कार्ड । मुख्य डाकघर की प्रभारी एस के सिंह ने बताया कि अब जो भी पोस्टकार्ड बिकते है वो आवेदन पत्र के प्रयोग के लिए ही बिकते है। क्योंकि कुछ सरकारी विभागों में आवेदन पत्र प्राप्ति की सूचना देने के लिए ही पोस्ट कार्ड का प्रयोग किया जाता है। वे कहते है कि सूचना युग में अब लोगों को घर बैठे ही सारी जानकारियां मिल जाती है जो बहुत ही अच्छा है। पर उस जमाने में खतों का जो इंतजार होता था और उन खतों को लोग याद के रुप में संजोकर रखते थे साथ ही उनसे आत्मिक रिश्ता सा लगता था। वो सब मोबाइल व कंप्यूटर के द्वारा खत्म सा हो गया है। इसका विभाग की आय पर भी विपरीत असर पड़ा है। अब पोस्ट कार्ड अंतरदेशीय की तो बिल्कुल भी ब्रिकी नहीं   होती है।  अब सिर्फ लिफाफे पर लगने वाला टिकट ही बिकता है। स्पीड पोस्ट एवं रजिस्ट्री में कंप्यूटराइज मुहर लग जाती है।

वाट्सएप ,फेसबुक ,मेल का है जमाना:

अब तो किसी तरह का संदेश चन्द सेकंडों में ही लोगो तक पहुंच जा रहा है।आज के युवा दिन भर सोशल साइड पर जुड़े रहते हैं।वाट्सएप हो या फेसबुक पुर दिन लोग इससे जुड़े रहते हैं । इससे इन पर स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ रहा है।देर देर रात जागकर चेटिंग करते रहते हैं।फेस बुक के राजनीतिक पोस्ट पर बढ़चढ़ कर कमेंट करना यह शुभ सन्देश नही है।युवाओं को इससे बचना चाहिए।

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