
एक वक़्त हुआ करता था जब दिवाली आते ही घरों में कंदील लग जाया करता था। कंदील के अंदर रौशन करता दिया दूर से ही दिवाली आने का संकेत दे जाता था। अब युग बदलता जा रहा है, बहुत कुछ बदल रहा इसी बदलते वक़्त ने कंदील की अहमियत को भी बदल कर रख दिया। कंदील को आकाशदीप के नाम से भी पुकारा जाता रहा है। दिवाली के समय अपने घर पर ऊँचे स्थान पर इसे लगाया करते हैं। ऐसी मान्यता रही है कि घर के पूर्वज इससे ख़ुश होते हैं। उनकी आत्मा दिवाली के समय घर में आकर अपने परिवार के साथ इस ख़ुशी के मौक़े पर शामिल होते हैं।
मिट्टी के दिये की खपत दिवाली के समय पहले के मुक़ाबले कमती जा रही है। दिया को मोमबत्ती तो मोमबत्ती को विद्युत संचालित बत्तियों ने बदल कर रख दिया। ऐसे बदलाव के दौर में जहाँ दिया का अस्तित्व कमता जा रहा हो वहाँ भला कंदील का क्या महत्व बचेगा? बहुत कोशिश करेंगे तो शायद किसी घर के छत पर ओ रंगबिरंगी कंदील और उसके अंदर रौशन करता दिया दिख सकेगा। जितना भी विरोध कर लें, जितना भी शपथ ले लें परंतु यह सच है कि हमारे जीवन से लेकर पर्व त्योहारों पर चायनीज़ उत्पादों ने अपना दबदबा बना रखा है। इतने सस्ते दामों में दिवाली में रंगत बिखेरने वाली लाइट उपलब्ध होती है कि क़समें खाने के बाद भी उससे अपने घरों को सज़ा रखे हैं।
ऐसे में कंदील अब तुम्हें कहाँ ढूँढे? दिवाली और कंदील साथ साथ कहाँ दिख रहा? अब तो कंदील भी यही पूछ रहा कि “हमारे हक़ का दिया कहाँ गुम हो गया?”