मंसूर आलम की रिपोर्ट:-
आज दिनांक 2 सितम्बर 2017 को दाउदनगर में धूम-धाम से ईद-उल-जुहा (बक़रीद) गया। शहर के सभी मस्जिदों के साथ-साथ ईदगाह में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ईद की नमाज़ अदा किये। नमाज के बाद सभी एक-दुसरे से गले मिलकर मुबारकबाद दिए। विदित हो की ईस्लामीक साल में दो बार ईद मनाई जाती है जिनमें से एक ईद-उल-जुहा और दूसरी ईद-उल-फितर, ईद-उल-फितर को मीठी ईद भी कहा जाता है। इसे रमजान के खत्म होने के बाद मनाया जाता है। लेकिन ईद-उल-जुहा का महत्व अलग है। हज की समाप्ति पर इसे मनाया जाता है। इस दिन बकरे की कुर्बानी देने का प्रचलन है। ईस्लाम के पांच फ़रायज़ (एकेश्वरवाद, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज़) में हज भी शामिल है। जो आर्थिक रूप से सक्षम है उनपर हज फ़र्ज़ है वैसे लोगों पर जिंदगी में एक बार हज करना जरूरी है। हज होने की खुशी में ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है। यह बलिदान का त्योहार है।
ईस्लामिक मान्यता के अनुसार हजरत इब्राहिम अपने बेटे हजरत ईस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा की राह में कुर्बान करने जा रहे थे, लेकिन अल्लाह ने उनके बेटे को जीवनदान दे दिया, बेटे के जगह एक दुम्बा (एक मरुस्थलीय जीव) ज़िबह हो गया। तब से उनके याद में ये त्योहार मनाया जाता है।
