इस्लाम ज़िंदा होता है करबला के बाद

दाउदनगर बाजार से शाहिद कयूम की रिपोर्ट:

मोहर्रम इस्लामिक कैलेण्डर का पहला महीना है और इसी महीने की 10 तारीख को अल्लाह के प्यारे रसूल-मोहम्मद-सलल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन ने 61 हिजरी को दमिष्क के यज़ीदी शाशक के नापाक इरादों को निस्तोनाबुद करते हुए उन्होंने यह दिखा दिया कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी और ताक़तवर क्यों न हो उसे सच्चाई के सामने हारना ही पड़ता है। करबला के मैदान (मौजूदा समय में इराक़ में उपस्थित है) में सिर्फ अपने 72 अनुनायीयों के साथ यज़ीदियों की हज़ारों की फौज़ का मुहतोड़ जवाब देते हुए हक़ की लड़ाई लड़ी और शहीद होकर इस्लाम को एक बार फिर से जिंदा कर गए। किसी शायर ने कहा है:- इस्लाम जिन्दा होता है करबला के बाद।

भारत के बाकी सारे शहरों की तरह दाउदनगर में भी मुहर्रम की दस तारीख को ताज़िये के साथ जुलुस निकाला जाता है। दाउदनगर में हज़ारों की तादाद में मुस्लिम भाई शांतिपूर्वक मुहर्रम के जुलुस में शामिल हुए। 

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