काली स्थान का मेला – बच्चों के खुशियों का पिटारा

नौरात्री के समापन के पश्चात विजयादशमी के दिन शाम होते ही बच्चों में मेला घूमने की उत्सुकता अभिभावकों को भी भावुक कर जाती है। अपने उम्र के मुताबिक बच्चे अलग अलग तरह के पसंदीदा पहनावे में मेला जाने के लिए आतुर हो उठते हैं। उन्हें देख कर अपने बचपन का कुछ पल भी याद आ जाता है। मेला घूमते समय ओ चाट के ठेले जहाँ दर्जनों की भींड़ में से चिल्लाते हुए एक बच्चे की आवाज़ “केतना झाल दे देला” मेला की खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। कुछ पल के लिए उस मेले में बड़े भी बच्चे की तरह हरकतें करते हुए नज़र आते हैं वरना जो हमेशा साफ सफाई की दुहाई देते रहते हैं ओ भी भला धूल मिट्टी और गन्दगी के बीच गरमा गरम जलेबी का स्वाद क्यों लेते? ऐसा इसलिए कि यह मेला है और यहाँ खुशियाँ बिकती हैं

बच्चों को भला कौन समझाए कि मिट्टी से बना हुआ तोता न तो बोल पायेगा और नाही उड़ पायेगा, उन्हें क्या पता कि कपड़ों से निर्मित घोड़े दौड़ नहीं सकते फिर भी उन पर बैठ कर सपनों की दुनिया की तरफ दौड़ लगाने की कोशिश करते हैं। फ्री में जो कुछ मिल जाए उसके लिए लंबी कतार में भी लग जाना कोई उनसे सीखे अब चाहे ओ मंदिर का प्रशाद ही क्यों न हो। निशानेबाजी करने का मौका जिन बच्चों को मिल जाता है तो मानो कि ओ सरहद पे किसी युद्ध से लौट रहे हों। चेहरे पे नयी उम्म्मीद और मुस्कान भरे बच्चों का शरारती अंदाज़ कालीस्थान मेला को बनाता है बच्चों के खुशियों का पिटारा।

यह मेला है और यहाँ बच्चों के लिए हज़ार खुशियाँ बिकती हैं

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