रहमत और बरक़त का महीना है रमज़ान

 रहमत व बरक़त का महीना रमज़ान इस्लामिक कैलेण्डर का नवां महीना है। रमज़ान का महीना साल के बाकि सभी महीनों में सबसे अफ़ज़ल (सर्वश्रेष्ट) महीना माना जाता है। इस महीने में एक नेकी के बदले सत्तर नेकी करने का सवाब मिलता है, इसीलिये तो इस महीने को नेकियों का मौसम भी कहा जाता है। अल्लाह अज़ोवज़्ज़ल ने रमज़ान की 27वीं रात जिसे सब-ए-कद्र की रात भी कहा जाता है को क़ुरान का नुजूल (अवतरित) प्यारे रसूल मोहम्मद सल्ललाहु अलैहे वसल्लम पर फ़रिश्ता (ईश्वरदूत) जिब्रईल अमीन के ज़रिए किया। इसीलिये इस महीने में लोग क़ुरान की तिलावत कसरत से करते हैं। साथ ही पूरे महीने तरावीह की नमाज़ में क़ुरान पढ़ा जाता है जिसमें क़ुरान न पढ़ने वालों को भी क़ुरान सुनने का मौका मिलता है।

रमज़ान में रोज़े का मक़सद सिर्फ़ भूखे-प्यासे रहना ही नहीं है, बल्कि अल्लाह की इबादत करके उसे राज़ी करना है। रोज़ा पूरे शरीर का होता है। रोज़े की हालत में न कुछ ग़लत बात मुँह से निकाली जाए और न ही किसी के बारे में कोई चु्ग़ली की जाए। ज़बान से सिर्फ़ अल्लाह का ज़िक्र ही किया जाए, जिससे रोज़ा अपने सही मक़सद तक पहुँच सके। रोज़े का असल मक़सद है कि बंदा अपनी ज़िन्दगी में तक्वा ले आए। वह अल्लाह की इबादत करे और अपने नेक आमाल और हुस्ने सुलूक से पूरी इंसानियत को फ़ायदा पहुँचाए।

इस महीने की ख़ासियत:-

1- चाँद दिखने के बाद पूरे महीने का रोज़ा रखना फ़र्ज है।

2- रात में तरावीह की नमाज़ पढ़ना।

3- क़ुरान की तिलावत ज़्यादा से ज़्यादा करना।

4- एतेक़ाफ़ पर बैठना यानि गांव और लोगों की बेहतरी के लिए दुआ मांगना और अल्लाह अज़ोवज़्ज़ल से अपनी गुनाहों की माफ़ी मांगना। इसके लिए रमज़ान के आख़िरी 10 दिन मस्जिद में रहकर बिताया जाता है।

5- ज़कात और फितरा देना।

6- अल्लाह का शुक्र अदा करना। अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए इस महीने के गुज़रने के बाद शव्वाल महीने की पहली तारीख को ईद उल-फ़ित्र मनाते हैं।

(शाहिद क़य्यूम)

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.