चुनौतियों को अपनाकर निष्पादित करने में माहिर हैं संतोष बादल


अक्सर हम यह कह कर बहुत सारी मौकें यूँही गवाँ बैठते हैं कि ये काम बहुत कठिन है और मुझसे यह नही हो सकता। अगर सकारात्मक सोंच रखकर यह सोंचें कि यह हो जायगा, ये मैं कर सकता हूँ जैसी भावना लाने से मुश्किल काम भी आसान हो जाता है। हो सकता है कि ऐसी बहुत सी चीजे हों जिन पर हमारा पूरा नियंत्रण ना हो लेकिन यदि हम अपनी पूरी सामर्थ्य और मन को उस काम करने में लगाते हैं तो हमें बाद में कोई पछतावा नही रहता। ऐसी ही सोंच के साथ अपने कार्यों को बख़ूबी पूरा करने का जज़्बा रखने वाले व्यक्ति का नाम है संतोष बादल


नाम पढ़ने के बाद शायद ही कोई व्यक्ति कंफ्यूज होगा कि कौन संतोष बादल क्यूँकि यह नाम दाऊदनागर की मिट्टी से जुड़ा हुआ है जो अपने शहर को राष्ट्रीय मानचित्र पर चिन्हित करने का प्रयास लगातार करते आ रहे हैं। हमारे आस पास दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो बिना समझे कह देते हैं कि I CAN’T और दूसरा ओ जो I CAN के सिद्धांत को मानते हैं। I CAN का सिद्धांत मानने वालों के लिए किसी भी चुनौती को स्वीकार करना या लाइफ में जोखिम लेना मुश्किल नहीं होता है, और वही लोग जीवन में सफलता की बुलंदियों को छू पाते हैं। 

स्पॉट बॉय से वीडियो एडिटर, एडिटर से ग्राफिक्स हेड, वहां से सफर तय करते हुए निर्देशक और लेखक बने। तत्पश्चात निर्माता और अब सीसीओ ऑफ़ अर्थ इंटरटेन्मेंट के रूप में कार्यरत है। फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में अपने आप को और बेहतर करने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं। अपने इस संघर्ष को वे इस प्रकार बयान करते हैं- बहुत संघर्ष है भाई। लेकिन हार नहीं मानेंगे, चार पांच जोड़ी जूता ख़रीदे हैं साल भर में देखते हैं कितना फटेगा

कई बार हम सोच या नजरिये की बात करते हैं, और ये संतोष बादल जी की सोच ही है, जो उनको सफल होने की संभावना को निर्धारित करती है। किसी ने उनको चैलेंज किया कि सन्तोष बादल 2 लाख में फ़िल्म बनाने का ढ़िढोरा पिट रहे है, कहीं इतने छोटे बजट में फ़िल्म बनती है, लेकिन इस बात को एक चुनौती मानते हुए फ़िल्म का निर्माण उसी बजट में कर रहे हैं। फ़िल्म का नाम है “कागज के फूल
फिर किसी ने बोला 3500 करोड़ के बजट वाली फ़िल्म “नालंदा” का ढ़िढोरा पिट रहे हैं, कैसे बनेगी इतनी महंगी फ़िल्म? तो संतोष बादल जी का प्यार भरा जबाब- दोस्त वो भी बनाएंगे, बस आप प्यार देते रहिये। सबसे सस्ती फ़िल्म बनाने के बाद दुनिया की सबसे महंगी फ़िल्म बनाने की तरफ कदम बढ़ाएंगे हम सब और होंगे कामयाब। ये है उनकी सकारात्मक सोच जो उनके जीवन के कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

जब उन्हें महाराष्ट्र अवार्ड से नवाजा गया तो पूरा शहर और हम दाऊदनगर वासी गौरान्वित mahsus किए। चलिए जानते हैं उनके अबतक के सफ़र के बारे में-

-1996 में दाउदनगर को छोड़ कर मुम्बई चले गए

-1998 से 2000 तक Editor रहें, 7 अवार्ड जीते

-2000 से अब तक 7000 एपिसोड से ज्यादा धारावाहिको का निर्देशन कर चूके। अब तक 9 अवार्ड जीते।

-इसी दरम्यान 2 हिंदी वर्ल्ड सिनेमा “The Return of Dr. Jagdish chandra basu-2010” तथा “Final Match-2015” का निर्देशन किया

-दो भोजपुरी फ़िल्म भी इनके नाम “सिंदूर बड़ा अनमोल सजनवा-2005” तथा “पकड़वा दूल्हा- 2007”

-एक सुप्रसिद्ध मैथिलि फ़िल्म “कखन हरब दुःख मोर”

-यह लेख लिखे जाने तक “बुक एंड बम” फ़िल्म की तैयारी तथा छोटे वजट की मगही फ़िल्म “कागज के फूल” की शूटिंग

पर अब भी वे कहते है कि सच यही है कि अभी भी मैं जीरो हूँ और इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए मैं लगातार संघर्ष कर रहा हूँ। “वीर तुम बढे चलो “…

2 लाख की फ़िल्म का अभियान ईसी वर्ष 2 जून से गया, बोधगया, राजगीर, नालंदा, रांची से शूटिंग खत्म करते हुए, 7 तारीख से दाउदनगर में शूटिंग शुरू की जाएगी। 7 से 17 तक शूटिंग के दरम्यान एक दिन दाउदनगर में जितिया का माहौल बना कर जितिया का शूटिंग होगा, मजा आ जायेगा उस दिन। अपने शहर दाउदनगर की संस्कृति पर उनके द्वारा शूटिंग करना हम सबके लिए काफी आनंदमय होगा। 18 को शूटिंग सम्पन्न हो जाएगी और इस फ़िल्म को स्थापित डिस्ट्रीब्यूटरो के माध्यम से रक्षा बंधन के समय भव्य रूप से प्रदर्शित किया जाएगा। 2 लाख की मिशन नामुमकिन दिखाई देती है पर उनके लिए है बहुत आसान। चैलेंज स्वीकार है इनको और साबित करेंगे, इंतजार कीजिये। इस पोर्टल के माध्यम से दाउदनगर के ही धरती पर जन्मे इस संघर्षसशील फ़िल्म डायरेक्टर संतोष बादल का मीडिया, जन प्रतिनिधि, प्रसासन और दाउदनगर वासी सहयोग करे, जिससे ये अपने अभियान में सफल हो और दाउदनगर का गौरव बढ़े। यही हमारी हम सबकी कामना है, धन्यवाद।

लेख- संजय गुप्ता (दाऊदनगर निवासी)

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