आइये जानते हैं किसलिये की जाती है सावत्री व्रत

गुरूवार को वट सावित्री व्रत है। अखंड सौभाग्यवती की कामना हेतू महिलाएं यह व्रत करती हैं। इसी दिन सती सावित्री ने अपने मृत पति सत्यवान को यमराज से जीवन प्राप्त किया था। आचार्य पंडित लालमोहन शास्त्री ने कहा कि वैवाहिक कार्यक्रम के अंदर कन्या पक्ष में वट वृक्ष की पूजा करना एक महत्व रखता है। कन्या का भाई और भाभी वट वृक्ष के नीचे महिलाओं के साथ जाती हैं। कन्या जब वट वृक्ष की पूजा कर सुता लपेटते हुये परिक्रमा करती है तो कन्या का भाई तलवार से वट के पता को काटता है और भाभी चुनकर कन्या की गोद में रखती है। इसे मगह के लोग वरकटटी कहते हैं। लोगों में आस्था है कि इस आयोजन से जिस प्रकार सावित्री ने अपने पति का प्राण यमराज से लडकर वट वृक्ष के नीचे ही प्राप्त किया था उसी प्रकार कन्या अखंड सौभाग्य को प्राप्त करे और उसके पति दीर्घायु हों। अमरता प्राप्त यदि कोई वृक्ष है तो वह अक्षय वट है। जहां पांच वट का वृक्ष हो उसे पंचवटी कहा जाता है। श्री शास्त्री ने कहा कि वट सावित्री वृक्ष दक्षिण भारत में तीन दिनों तक किया जाता है। ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से प्रारंभ कर अमावस्या को संपन्न किया जाता है। कुछ स्थानों पर केवल अमावस्या को ही यह व्रत किया जाता है। वट वृक्ष भीषण गर्मी शीतलता प्रदान करता है। पर्यावरण शुद्धीकरण के लिए भी वट वृक्ष लगाना चाहिए। महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना से वट सावित्री व्रत करती हैं।

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