शहर का कई इलाक़ा जुवे का अड्डा बनता जा रहा


इक्कीसवीं सदी में जहाँ हम भारतीय अपने देश को विकास की बुलंदियों को छूते हुए देखना चाहते हैं वहीं हम में से कुछ लोग अपनी तुच्छ मँसिक्ता से समाज को लगातार प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। अफ़सोस कि हमारा शहर भी कई प्रकार के छोटे छोटे बुराइयों से ग्रसित होता जा रहा है जिसके ज़िम्मेदार प्रशाशन के साथ साथ हम भी हैं। शहर के कई इलाक़ों से यह ख़बर आ रही है कि जुवारी लोग मजमा बना कर जुवे खेल रहे हैं और कई हज़ार रुपए के दावँ लगा रहे हैं।

स्वभाविक रूप से स्थानीय लोग उन जुवारियों से परेशान हो रहे हैं मगर उनकी कौन सुने? जुवे खेलने वाले लोग भी स्थानीय हैं जिसके कारण उनपर सख़्त रवैया अपनाने में हिचकिचाते हैं। देखने में तो यह छोटी मोटी सामाजिक बुराई लगती है परन्तु ग़ौर करें तो इस प्रकार की बुराई हमारे समाज को दीमक की तरह नष्ट कर रही है। उन जुवारियों को समझाने के दौरान कई दफ़ा लम्बी बहस और भनयनकर लड़ाई का रूप भी धारण कर लेती है। बाड़ी बात यह है कि इसका सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ता है और कई बच्चें इस प्रकार के बुरी आदत के शिकार हो जाते हैं। जुवारी लोग समय और पैसे की बर्बादी करने में इस प्रकार लिप्त हैं कि उन्हें अपने घर के बच्चों के भविष्य के बारे में भी चिंता नहीं होती।

बेहद ज़रूरी है कि प्रशाशन द्वारा जुवारियों के अड्डे पर धावा बोलकर इस प्रकार की सामाजिक बुराइयों को होने से रोका जाए। सामाजिक कार्यकर्ता एवं जन प्रतिनिधियों को भी इसका विरोध कर यथासम्भव इसे रोकने का प्रयास करना चाहिए।

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