जनता की आवाज़ : हम ही क्यों कैशलेस हो, राजनेता क्यों नही?

 संजय गुप्ता

संजय गुप्ता

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हमारे पैसे, हमारे अपने हैं। उन्हें हम नगद खर्च करें या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से, यह हमारी मर्ज़ी है। यदि देश की सरकार को कैशलेस व्यवस्था लागू करने की इतनी ही जल्दबाजी है तो बेहतर होगा कि वह इसकी शुरूआत ख़ुद करें। तत्पश्चात हमारे आगे उदाहरण उपस्थित करें। काले-धन की गोद में पली-बढ़ी पार्टियां जब देश को सदाचार का पाठ पढ़ाती है तो गुस्सा आना लाज़मी है। हम भारत सरकार के कैशलेस लेन-देन के प्रस्ताव को तबतक के लिए खारिज करते हैं जबतक सरकार हमारी तीन मांगे नहीं मान लेती है।

पहली मांग यह है कि सरकार क़ानून बनाकर यह सुनिश्चित करे कि भाजपा सहित तमाम राजनैतिक दल भविष्य में कैश में कोई चंदा स्वीकार नहीं करेंगे। उन्हें दिया जाने वाला कोई भी चंदा या दान सिर्फ चेक, डेबिट कार्ड या इलेक्ट्रॉनिक वॉलेट के माध्यम से ही भुगतान किया जाएगा, जिस प्रकार हम आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं। तथा हर पार्टी वित्तीय वर्ष के अंत में अपने आमद-खर्च का हिसाब अपने वेबसाइट पर ज़ारी करेंगे। इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन करने वाले दल की मान्यता ख़त्म करने का प्रावधान हो।

दूसरी मांग यह है कि देश के सभी दलों के राजनेता उड़नखटोले से घूम-घूमकर महंगी-महंगी रैलियों और जन सभाओं में अपनी बात रखने या चुनाव प्रचार करने के बजाय आम जनता से ऑनलाइन संपर्क ही करें। इसके लिए सरकार एक ऐसे टीवी चैनल की व्यवस्था करें, जहां राजनैतिक दलों के लिए अपनी पार्टी का पक्ष रखने का समय निर्धारित हो। राजनेता अगर चाहें तो अपना भाषण रिकॉर्ड कर यूट्यूब या सोशल साइट्स पर डाल सकते हैं।

तीसरी और अंतिम मांग यह है कि हैकिंग और कार्ड क्लोनिंग के इस दौर में सरकार या बैंक हमारे पैसों की सौ प्रतिशत सुरक्षा का ज़िम्मा लें तथा ऑनलाइन लेन-देन में जालसाजी होने पर हमारे पैसे ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह में जांच कर लौटाने की निश्चित व्यवस्था की जाए।

जबतक ऐसा नहीं हो जाता, सरकार को हमें कैशलेस हो जाने का सुझाव देने का क्या कोई नैतिक अधिकार है?

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