टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पत्रकार निखिल अब नहीं रहे- पत्रकारों में गहरा शोक

औरंगाबाद से टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए पत्रकार निखिल कुमार की कल रात तक़रीबन डेढ़ बजे मौत हो गई है। उन्हें पिछले 3-4 दिनों से कफ से परेशानी हो रही थी जिसके जाँच के लिए उनके पिता राकेश कुमार सिंह और मामा मनोज कुमार सिंह उन्हें बनारस ले गए जहाँ चिकित्सकों ने उनके फेफड़े में पानी होने की बात कही। महज 28 वर्ष की उम्र में उनकी मौत अस्पताल में चिकित्सा के दौरान हुई।

निखिल ने अपना करियर पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रत्युष नव बिहार अख़बार से किया जिसमें जिला के वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शी किशोर ने उन्हें पत्रकारिता सिखने में काफी मदद की। उन्होंने सन्मार्ग, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, राष्ट्रीय सहारा, टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए पत्रकारिता की। उनका चयन टाइम्स ऑफ़ इंडिया में हो गया था और ओ रांची जाकर ज्वाइन करने वाले थे। अकस्मात् मौत के कारण जिले के पत्रकारों के बीच गहरा शोक है और हर कोई उनके आत्मा की शाँति की दुआ कर रहा।

दाउदनगर अनुमंडल पत्रकार संघ के सचिव उपेंद्र कश्यप, अध्यक्ष सत्येंद्र जी और कोषाध्यक्ष सबा कादरी के साथ साथ प्रभात खबर के पत्रकार ओम् प्रकाश, मृदुल राज तथा परिवर्तनकारी शिक्षक संघ के मीडिया प्रभारी सुनील बॉबी,  ने आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है।
न्यूज़ पोर्टल एमा टाइम्स तथा दाउदनगर.इन के पत्रकारों ने भी उनकी आत्मा की शाँति की दुआ की है।
——— सनोज पांडेय के शब्द———

विलक्षण प्रतिभा का धनी था निखिल 

मैंने अपना भाई खो दिया, वो हमसे बेहद प्रेम करता था, अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा सजग रहा। उसकी लेखनी में वाकई दम था। वो अब हम लोगों के बीच नहीं रहा परंतु उसकी यादें जीवन भर साथ नहीं छोड़ेगी।
——-उपेंद्र कश्यप के शब्द———

मैं यात्रा में हूँ। निखिल बार बार स्मरण आ रहा है। उसके साथ बिताया हर पल। अभी कुछ माह पूर्व ही अंतिम मिलन अनुग्रह नारायण रेलबे स्टेशन पर हुआ था। वही खिलखिलाना और हंसना। साथ में मनिष भाई थे। हम वाराणसी जा रहे थे और वह पटना। उसने ट्रेन पकड़ाते पकड़ाते मुझे छेड़ा। क्या दुर्योग है उस वक्त मुझे उसने देहरादून पकड़ाया था और अभी उसी ट्रेन में बैठ कर यह पंक्ति लिख रहा हूँ। तब भी वाराणसी जा रहा था अभी भी बनारस जा रहा हूँ। हालांकि यह यात्रा लंबी है। मुम्बई और   गुजरात की भी यात्रा है। निखिल तुम्हारा शरीर चला गया। जो नश्वर होता है। तुम्हारे कर्म यही रह गए। अपनों के बीच तुम हमेशा जीवित रहोगे। अपनी लेखनी और व्यवहार छोड़ गए हो जो सबको तुम्हारा स्मरण कराते रहेंगे।

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