जयपुर ने सुनी संजय कुमार की “आवाज भी देह है”

दीपक अरोडा सम्मान ग्रहण करते संजय शांडिल्य

दीपक अरोडा सम्मान ग्रहण करते संजय शांडिल्य

दाउदनगर (औरंगाबाद) संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह ‘आवाज भी देह है’ को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया तथा उन्हें जयपुर में दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। उनके मित्र उपेन्द्र कश्यप ने बताया कि संजय यहां दाउदनगर महाविद्यालय से सेवारत अध्यापक एसके शांडिल्य और अंकोढा मिडिल स्कूल में कर्यरत शिक्षिका मांडवी पांडेय के बडे पुत्र हैं। दाउदनगर के विवेकानंद मिशन स्कूल से शिक्षक के रुप में उन्होंने अपने कैरियर की शुरुवात की और अभी गोपालगंज सैनिक स्कूल में शिक्षक के रुप में कार्यरत हैं। बिहार गीत भी उन्होंने ही लिखा था जिसके लिए राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था। उपेन्द्र कश्यप ने बताया कि बोधि पुस्तक पर्व के चौथे सेट की दस और दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना के तहत प्रकाशित पांच पुस्तकों का लोकार्पण सोमवार की शाम पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर के सभागार में हुआ। मुख्य वक्ता डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने “पुस्तक संस्कृति और हमारा समय” विषय पर विस्तार से चर्चा की। डॉ हेतु भारद्वाज ने आशीर्वचन कहे और दीपक अरोड़ा की बहन सोनिया अरोड़ा ने अपने संस्मरण साझा किये। कार्यक्रम अध्यक्ष  प्रेसक्लब महासचिव मुकेश चौधरी ने सभी शामिल रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएं दी। दोनों योजनाओं में शामिल रचनाकारों में से उपस्थित रचनाकारों- अंजता देव, विनोद पदरज, गोविन्द माथुर, विपिन चौधरी, अमित आनंद पांडेय, संजय कुमार शांडिल्य और अस्मुरारीनंदन मिश्र का सम्मान किया गया। दीपक अरोड़ा की अर से उनकी बहन ने यह सम्मान स्वीकार किया। अतिथि कवियों के शानदार काव्‍य पाठ के साथ आयोजन का समापन हुआ। दीपक अरोड़ा की कविताओं का पाठ अंजना टंडन ने किया। बोधि प्रकाशन की ओर से बनवारी कुमावत राज ने सभी का आभार व्यक्त किया। आवाज भी देह है किताब के लोकार्पण के अवसर पर प्रेस क्लब के सभागार में दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान ग्रहण करते और कविता पाठ संजय कुमार शांडिल्य ने किया। 

बडी उपलब्धि, बडी खूशी विवेकानंद मिशन स्कूल के निदेशक डा.शम्भू शरण सिंह ने कहा कि संजय के साथ काम करने का अवसर मिला। सोशल साइंस का टीचर होने के बावजूद अंग्रेजी व हिन्दी भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ है जो वे साहित्यिक प्रतिभा के भी धनी हैं। बच्चे उनसे काफी प्रभावित थे और बच्चों को कविता लिखने की प्रेरणा भी उनसे मिलती रही। यहाँ तक कि स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम  के लिए स्वागत गीत भी इन्होंने लिखा। कहा कि वे प्रगति के पथ पर चलते रहें, उनकी कलम बढे, समाज को साहित्य के माध्यम से सेवन करें और नया रास्या दिखाये यहीं कामना है। उनकी मां मांडवी और पिता एसके शांडिल्य ने बेटे की उपलब्धि को दाउदनगर की मिट्टी की देन बताया। कहा कि उसने जो सीखा इसी शहर से सीखा। साहित्य में उसकी रुचि बचपन से थी।

पेश है “आवाज़ भी देह है” की चंद पंक्तियां

तुम हमारी आवाजें खा रहे हो

रूई के फाहों सी

हवाओं के दस्तक सी

निरपराध आवाजें।

यह शोर, इसकी आँखें हैं

जिस पर काली पट्टी बँधी है

मस्तिष्क है जिसमें उन्माद भरा है

इसके हाथ हैं लोहे के।

समुद्र के खारेपन से भरा

इस शोर में इस शोर की

जकङी हुई देह है

Leave a Reply